महापर्व छठ करने की उचित विधि एवं समय जाने। – अध्यात्मिक गुरु कमलापति त्रिपाठी जी।

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20 नवम्बर शुक्रवार 2020 को संध्याकालीन अर्ध्य तो 21नवम्बर शनिवार 2020 को उदित अर्ध्य देगें व्रती !
सूर्य देव की उपासना ही छठ पर्व से जुड़ा है और इसका पौराणिक तथा वैज्ञानिक महत्व भी है। कहा जाता है कि अस्ताचलगामी और उगते सूर्य को अघ्र्य देने के दौरान इसकी रोशनी के प्रभाव में आने से कोई चर्म रोग नहीं होता और इंसान निरोगी रहता है !


छठ का त्यौहार सूर्य की आराधना का पर्व है, हिंदू धर्म के देवताओं में सूर्य देव का श्रेष्ठ स्थान है और हिंदू धर्म में इन्हें विशेष स्थान प्राप्त है ! प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण को अर्ध्य देकर दोनों का नमन किया जाता है सूर्योपासना की परंपरा ऋग वैदिक काल से होती आ रही है सूर्य की पूजा महत्व के विषय में विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में विस्तार पूर्वक उल्लेख प्राप्त होता है !
सृष्टि और पालन शक्ति के कारण सूर्य की उपासना सभ्यता के अनेक विकास क्रमों में देखी जा सकती है ! काल से ही सूर्य को आरोग्य के देवता माना गया है वैज्ञानिक दृष्टि से भी सूर्य की किरणों में कई रोगों को समाप्त करने की क्षमता पाई गई है .सूर्य की वंदना का उल्लेख ऋगवेद में मिलता है तथा अन्य सभी वेदों के साथ ही उपनिषद आदि वैदिक ग्रंथों में इसकी महत्ता व्यक्त कि गई है !


सम्पूर्ण जगत में सूर्य ऊर्जा का अक्षय स्त्रोत है । मूलत: प्रकृति पूजा की संस्कृति वाले इस देश में, सूर्य की पूजा किसी भी परम्परा से बहुत- बहुत पुरानी है । यह वैदिक काल से है। लेकिन शास्त्रीयता और पांडित्य को लोक अपनी शर्तो पर स्वीकार करता है और उसका मानवीकरण भी करता है। लोक मूलत: हमारा कृषि आधारित समाज ही है ।
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी की सूर्य पूजा (सूर्य षष्ठी) को भी अभिजन शास्त्रीयता के खिलाफ, किसानी जीवन (लोक) ने, अपना रंग दे दिया । जहां मां भगवती नीम की डाल पर झूला झूलती हैं और मालिन से पानी मांगती हैं । जहां सम्राट दशरथ की रानी कौशिल्या मचिया पर बैठती हैं ! ( लोकगीत में देखें) !
पूजा के लिए लाए पके केले को सुग्गा के जूठा कर देने का गुस्सा है। लेकिन मूर्छित सुग्गे को जीवन दान के लिए आदित्य से आराधना भी है। सूर्य से बिनती भी है कि वह जल्दी उदित हों ताकि उन्हें अ‌र्घ्य दिया जा सके !
खास बात यह कि पूजा में वही चीजें चढ़ेगीं जो किसानी जीवन में सर्वाधिक सुलभ है । गुड़, गन्ना, सिंघाड़ा, नारियल, केला, नींबू, हल्दी, अदरक, सुपारी, साठी का चावल, जमीरी, संतरा, मूली आदि !

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छठ पूजा का महत्व सनातन काल से ही देखा जा सकता है ! प्राचीन धार्मिक संदर्भ में यदि इस पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि सर्वप्रथम मनु के पुत्र प्रियब्रत ने छठ व्रत kikiy छठ पूजा का आरंभ महाभारत काल में कुंती द्वारा सूर्य की आराधना तथा सूर्य के आशीर्वाद स्वरूप उन्हें पुत्र कर्ण की प्राप्ति होने के समय से ही माना जाता है। इसी प्रकार द्रोपदी ने भी छठ पूजा की थी जिस कारण पांडवों के सभी कष्ट दूर हो गए और उन्हें उनका राज्य पुन: प्राप्त होता है ।
मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की आराधना कि जाती है तथा गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर के किनारे पानी में खड़े होकर यह पूजा संपन्न कि जाती है ।

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मान्यता अनुसार सूर्य देव और छठी मइया भाई-बहन है, छठ त्यौहार का धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी बहुत महत्व माना गया है इस कथन के अनुसार षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगौलीय अवसर होता है। इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं उसके संभावित कुप्रभावों से रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा में रहा है. छठ व्रत नियम तथा निष्ठा से किया जाता है। भक्ति-भाव से किए गए इस व्रत द्वारा नि:संतान को संतान सुख प्राप्त होता है ! इसे करने से धन-धान्य की प्राप्ति होती है तथा जीवन सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहता है ।
छठ व्रत को सभी हिंदू अत्यंत भक्ति भाव व श्रद्धा से मनाते हैं. इस पूजा का आरंभ इस वर्ष कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को है तथा कार्तिक शुक्ल सप्तमी को इसका समापन्न होगा । प्रथम दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को नहाय-खायके रूप में मनाया जाता है ! नहाए-खाए के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को खरना किया जायेगा !

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पंचमी को दिनभर खरना का व्रत रखने वाले व्रती शाम के समय गुड़ से बनी खीर, रोटी और फल का सेवन प्रसाद रूप में करते हैं इसके उपरांत व्रती ३६ घंटे का निर्जला व्रत करते हैं व्रत समाप्त होने के बाद ही व्रती अन्न और जल ग्रहण करते हैं । खरना पूजन से ही घर में देवी षष्ठी का आगमन हो जाता है ।
इस प्रकार भगवान सूर्य के इस पावन पर्व में शक्ति व ब्रह्मा दोनों की उपासना का फल एक साथ प्राप्त होता है ! षष्ठी के दिन घर के समीप ही किसी नदी या जलाशय के किनारे पर एकत्रित होकर पर अस्ताचलगामी और दूसरे दिन उदीयमान सूर्य को अर्ध्य समर्पित कर पर्व की समाप्ति होती है ! इस व्रत के करने का बहुत उतम फल है इसके करने से धन, धान्य, पुत्र, पौत्र, आरोग्यता की शीध्र होती है जो सर्वविदित है ! ॐ…

आध्यामिक गुरु श्री कमला पति त्रिपाठी "प्रमोद जी"
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आध्यात्मिक गुरू श्री कमला पति त्रिपाठी “प्रमोद”

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